राजनांदगाँव जिला (छत्तीसगढ़) में जनसंख्या संरचना

 

घनश्याम नागे1] देवेंद्रधर द्विवेदी2

1अतिथि सहा. प्राध्यापक (भूगोल), शासकीय पंडित जवाहरलाल नेहरू कला एवं विज्ञान स्नातकोत्तर महाविद्यालय बेमेतरा (..)

2सहायक प्राध्यापक भूगोल, शासकीय पंडित जवाहर लाल नेहरु कला एवं विज्ञान स्नातकोत्तर महाविद्यालय बेमेतरा (..)

*Corresponding Author E-mail: dr.g.nage10@gmail.com

 

ABSTRACT:

जनसंख्या एक गत्यात्मक अवधारणा है जो किसी क्षेत्र विशेष में देश-काल के अनुसार बदलती रहती है। अध्ययन क्षेत्र में जनसंख्या का वितरण असमान है। मध्यवर्ती उच्च प्रदेश एवं शिवनाथ के तटवर्ती प्रदेशों में जीवन यापन के अनुकूल साधनों की बहुतायत के कारण जनसंख्या का सघन वितरण पाया जाता है इसके विपरीत मैकल श्रेणी क्षेत्र एवं पनबरसा पहाड़ी प्रदेशों में जनसंख्या का वितरण विरल है। क्षेत्र में जनसंख्या घनत्व 192 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या वृद्धि दर 19.78 प्रतिशत है यहां जनसंख्या वृद्धि राष्ट्रीय स्तर की तुलना में 2.11 प्रतिशत अधिक तथा राज्य की तुलना में वृद्धि दर-3.07 प्रतिशत कम है। जिले के उत्तरी एवं मध्यवर्ती क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि दर सबसे अधिक (26.40 प्रतिशत) है। अध्ययन क्षेत्र में कार्यशील जनसंख्या 52.05 तथा साक्षरता दर 75.96 प्रतिशत है। जिले के मध्यवर्ती क्षेत्र समतल भू-भाग होने के साथ-साथ यहां पर शैक्षणिक सुविधाओं की पर्याप्त उपलब्धता होने के कारण साक्षरता का स्तर उच्च है। अध्ययन क्षेत्र में बाल एवं युवा आयु वर्ग के व्यक्तियों का प्रतिशत सबसे अधिक (75.82) है तथा प्रौढ़ एवं वृद्ध आयु वर्ग के व्यक्तियों का प्रतिशत 24.18 है। अध्ययन क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि वितरण शिक्षा एवं साक्षरता पर प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक कारको का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है जिसके कारण जिले के जनसंख्या वितरण में व्यापक असमानता पाई जाती है। इसके साथ ही ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या-अनुपात पर भी मानवीय एवं सांस्कृतिक कारको का विशेष प्रभाव पड़ा है

 

KEYWORDS: जनसंख्या, घनत्व, साक्षरता, लिंग अनुपात, व्यवसायिक संरचना.

 


 


प्रस्तावना -

संसाधन भूगोल के अध्ययन में मानव संसाधन का केंद्रीय स्थान है। भूतल पर जनसंख्या के वितरण में आदिकाल से लेकर वर्तमान काल तक परिवर्तन होता रहा है। यद्यपि परिवर्तन की गति एवं दिशा देश- काल के अनुसार भिन्न-भिन्न रही है। जहां एक ओर मानव निवास के लिए उपयुक्त स्थल-खंडों पर जनसंख्या का अत्यधिक जमाव हो गया है वहीं दूसरी ओर पृथ्वी के बड़े-बड़े भूखंड मनुष्य के लिए अनुपयुक्त होने के कारण पूर्णतया अथवा आंशिक रूप से निर्जन एवं वीरान पड़े हुए हैं। धरातल पर जनसंख्या के असमान वितरण के लिए अनेक प्राकृतिक तथा मानवीय कारक उत्तरदायी है। किसी भी देश राज्य और जनपद (जिला) में जनसंख्या या मानव संसाधन उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। जनसंख्या के उपयुक्त आकार और श्रेष्ठ गुणात्मक विशेषताओं के आधार पर ही क्षेत्र विशेष का विकास निर्भर करता है।

 

किसी भी क्षेत्र मे मानव निवास के लिए वहाँ जीविका के किसी किसी साधन का पाया जाना अनिवार्य होता है जैसे-खनन, उद्योग-धंधे, व्यापार, परिवहन एवं विविध सेवाएं आदि प्रमुख है। मानव सभ्यता का विकास प्रत्यक्ष रुप से साक्षरता से भी संबंधित रहा है और वर्तमान काल में वह देश या प्रदेश आर्थिक रूप से अधिक संपन्न हैं जहां साक्षरता दर उच्च है और वे देश पिछड़े हुए हैं जहां साक्षरता दर निम्न है। इतना ही नहीं साक्षरता का विभिन्न जनांकिकी पक्षों-जन्मदर, मृत्यु दर, प्रवास, व्यवसायिक संरचना, नगरीकरण आदि से घनिष्ठ संबंध पाया जाता है। अतः जनसंख्या की विशेषताओं तथा जनांकिकीय लक्षणों की क्षेत्रीय विभेदशीलता के अध्ययन के लिए साक्षरता का विश्लेषण भी भूगोलविद के लिए आवश्यक हो जाता है। अध्ययन क्षेत्र में जनसंख्या के असमान वितरण तथा जनांकिकी संरचना में प्रादेशिक विभिन्नताओं को समझना अत्यंत आवश्यक है।

 

अध्ययन का उद्देश्य

प्रस्तुत शोध अध्ययन का उद्देश्य निम्नांकित है।

1. अध्ययन क्षेत्र में ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या अनुपात का पता लगाना।

2. जनसंख्या वृद्धि दर का पता लगाना।

3. जनसंख्या का वितरण एवं घनत्व के सामान्य वितरण प्रतिरूप का पता लगाना।

4. अध्ययन क्षेत्र में साक्षरता एवं लिंगानुपात के क्षेत्रीय वितरण प्रतिरूप का पता लगाना।

5. आयु एवं व्यवसायिक संरचना का पता लगाना।

 

विधितंत्र

प्रस्तुत अध्ययन द्वितीयक आँकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है। जनसंख्या संबंधी आँकड़े जिला सांख्यिकी पुस्तिका एवं जनगणना पुस्तिका से प्राप्त कर आँकड़ों का विश्लेषण कर अध्ययन किया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्र

प्रस्तुत शोध अध्ययन का क्षेत्र राजनांदगाँव जिला है।राजनांदगाँव जिला छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण-पश्चिमी भाग में 20°7‘ से 21°50‘ उत्तरी अक्षांश एवं 80°14‘ से 81°13‘ पूर्वी देशांतर के मध्य अवस्थित है। जिले के पश्चिमी सीमा का निर्धारण महाराष्ट्र राज्य के भंडारा जिले द्वारा तथा उत्तरी-पश्चिमी सीमा का निर्धारण मध्यप्रदेश राज्य के बालाघाट एवं उत्तरी सीमा का निर्धारण कवर्धा जिला द्वारा होता है। उत्तर-पूर्वी भाग में दुर्ग एवं दक्षिणी भाग में कांकेर जिला इसकी सीमा का निर्धारण करते हैं। जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 8,227 वर्ग किलोमीटर है। अध्ययन क्षेत्र 9 विकासखण्डों में विभक्त है। अध्ययन क्षेत्र के तीन विकासखण्ड अंबागढ़ चौकी, मोहला एवं मानपुर पूर्णतया आदिवासी क्षेत्र है।

 

जनसंख्या का वितरण:-

भौगोलिक दशाओं के अनुसार जनसंख्या का स्थानिक वितरण और प्रतिवर्ग किलोमीटर में उपस्थित व्यक्तियों की संख्या जनसंख्या के प्रादेशिक विवेचन में महत्वपूर्ण पक्ष है

 

सारणी क्रमांक 1 राजनांदगाँव जिला जनसंख्या का वितरण 2011

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स्रोत:- जिला सांख्यिकीय पुस्तिका 2011

 

प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक उन्नति जनसंख्या के वितरण एवं उसके घनत्व पर निर्भर करता है। जिले में जनसंख्या का वितरण असमान है। मैकाल पहाड़ी, पनबरसा पहाड़ी प्रदेश एवं कांकेर पहाड़ी प्रदेश में जनसंख्या का वितरण विरल है। इसके विपरीत मध्यवर्ती उच्च प्रदेश एवं शिवनाथ के तटवर्ती प्रदेशों में समतल उपजाऊ मैदान, काँप मिट्टी, जल की पर्याप्त आपूर्ति, सुरक्षित यातायात परिवहन एवं संचार के साधनों के कारण जनसंख्या का वितरण सघन हैं

 

ग्रामीण एवं नगरीय अनुपात

ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के जनांकिकी लक्षणों में पर्याप्त अंतर पाया जाता है क्योंकि जहां नगरीय जनसंख्या भौतिक एवं सांस्कृतिक सुविधाओं से युक्त होती है, वहीं ग्रामीण जनसंख्या में इनका अभाव पाया जाता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल जनसंख्या 15,37,133 है। कुल जनसंख्या का 82.28 प्रतिशत ग्रामीण तथा 17.72 से प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती है, जिनकी जनसंख्या 2,72,512 है। जिले के राजनांदगाँव एवं डोंगरगढ़ विकासखंड में जनसंख्या का क्रमशः 44.89 तथा 17.96 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती है। इन क्षेत्रों में अधिक नगरीय जनसंख्या होने का प्रमुख कारण परिवहन के प्रमुख साधनों (रेल एवं प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग) का जुड़ा होना, व्यापारिक, बैंकिंग, चिकित्सा, शिक्षा, डाक तार, संचार के साधनों एवं रोजगार के सेवाओं का विकास होना प्रमुख है।

 

सारणी क्रमांक - 2 राजनांदगाँव जिला:- ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या प्रतिषत (2011)

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स्रोत:- जिला सांख्यिकीय पुस्तिका ,2011

अनुसूचित जाति एवं जनजाति जनसंख्या:-

जनजाति सामान्यतः वन मे अथवा एकाकी जीवन व्यतीत करते है। इनके आवास, वस्त्र ,वेशभूषा, रीतिरिवाज, भाषा, धर्म अथवा आर्थिक क्रियाकलापों में आदिम के लक्षण परिलक्षित होते हैं। राजनांदगाँव जिले में अनुसूचित जाति 10.19 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति 26.63 प्रतिशत अन्य जाति के 63.18 प्रतिशत लोग निवास करते हैं।

अध्ययन क्षेत्र में 6 प्रतिशत से कम अनुसूचित प्रदेश में मोहला मानपुर विकासखण्ड आते हैं ,यहां क्रमशः 5.88 5.12 प्रतिशत अनुसूचित जाति की जनसंख्या निवास करती है। शेष विकासखंड क्षेत्रों में अनुसूचित जाति के लोगों का प्रतिशत 7.87 से 12.48 प्रतिशत के मध्य है। अनुसूचित जनजाति प्रदेशों में 15 प्रतिशत से कम जनसंख्या छुरिया, राजनांदगाँव, खैरागढ़ छुईखदान विकासखंड में निवास करती है। जहां इनका प्रतिशत क्रमशः 4.28, 6.21, 9.05, 18.96 प्रतिशत है। 15 से 30 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति डोंगरगाँव, डोंगरगढ़ में निवास करती है। अध्ययन क्षेत्र में सबसे अधिक जनजाति मोहला मानपुर तथा अंबागढ़चौकी प्रदेश में मिलता है। यहां 45 से 75 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इस तरह जिले में अनुसूचित जाति जनजाति जनसंख्या के वितरण में बहुत अधिक असमानता मिलती है।

सारणी क्रमांक 3 राजनांदगाँव जिला: अनुसूचित जाति एंव अनुसूचित जनजाति वितरण प्रतिषत

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26.63

63.18

 

जनसंख्या घनत्व

किसी प्रदेश में निवास करने वाले मनुष्यों की संख्या और प्रदेश के क्षेत्रफल के पारस्परिक अनुपात से जनसंख्या का घनत्व मालूम होता है। घनत्व सामान्यतरू प्रति इकाई (वर्ग कि.मी.) क्षेत्र में मनुष्य की संख्या को इंगित करता है। यह घनत्व उस प्रदेश की उन्नति और भावी विकास का अनुमान लगाने में मुख्य आधार होता है। प्रत्येक प्रदेश की आर्थिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक उन्नति की योजना बनाने के लिए उस प्रदेश की जनसंख्या की सघनता को जानना बहुत आवश्यक होता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राजनांदगाँव जिले का औसत जनसंख्या घनत्व 192 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है जबकि इसके पड़ोसी जिले दुर्ग की जनसंख्या घनत्व 328 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है। इसका कारण कृषि के लिए विस्तृत समतल भूभागों का अभाव, कृषि के लिए सिंचाई सुविधाओं (नदियों को छोड़कर) के अन्य साधनों का अभाव औद्योगिक विकास की कमी, चिकित्सा, शिक्षा, संचार-साधनों का अभाव अन्य साधनों की कमी के कारण क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कम है।

जनसंख्या घनत्व एवं वितरण प्रतिरूप के आधार पर राजनांदगाँव जिले को 4 भागों में विभक्त कर अध्ययन किया जा सकता है -

1. अधिक सघन जनसंख्या का क्षेत्र

2. मध्यम सघन जनसंख्या का क्षेत्र

3. विरल जनसंख्या का क्षेत्र

4 अति विरल जनसंख्या का क्षेत्र।

 

1. अधिक सघन जनसंख्या का क्षेत्र

इस श्रेणी में 300 से अधिक व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में राजनांदगाँव एवं डोंगरगाँव विकासखंड सम्मिलित है। इस क्षेत्र में शिवनाथ नदी के निक्षेप से क्षेत्र की उर्वरता में वृद्धि हुई है। फलस्वरुप कृषि उत्पादकता अधिक है। यहाँ अधिकांश क्षेत्र में काली मिट्टी पाई जाती है सिंचाई का क्षेत्रफल अन्य विकासखण्डों की तुलना में अधिक है। नदी के किनारे विद्युतपंपों की संख्या अधिक है। इसके अतिरिक्त इस विकासखण्ड में नगरीकरण का अधिक होना एवं प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा होना सघन जनसंख्या के लिए उत्तरदायी है।

2. मध्यम सघन जनसंख्या का क्षेत्र

इस श्रेणी में जनसंख्या का घनत्व 200 से 300 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर के मध्य है। इस श्रेणी के अंतर्गत छुईखदान, खैरागढ, डोंगरगढ़ तथा छुरिया विकासखंड सम्मिलित है। यह क्षेत्र भी समतल मैदानी क्षेत्र होने के कारण जनसंख्या मध्यम सघन है।

3 विरल जनसंख्या का क्षेत्र

इस श्रेणी के अंतर्गत जिले के दक्षिणी एवं मध्यवर्ती क्षेत्र (मोहला एवं अंबागढ़चौकी) सम्मिलित है जहां जनसंख्या का घनत्व 100 से 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इन क्षेत्रों में चारागाह वन एवं कृषि योग्य बेकार भूमि की अधिकता के कारण यहां की जनसंख्या विरल है।

4. अति विरल जनसंख्या का क्षेत्र

इस श्रेणी के अंतर्गत जिले के एकमात्र दक्षिणी प्रदेश (मानपुर विकासखंड) सम्मिलित है। यहाँ जनसंख्या का घनत्व 100 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर से भी कम है। लाल रंग की मोटे कणो वाली कंकड़ युक्त कृषि अयोग्य भूमि का विस्तार, चारागाह, घास एवं वन क्षेत्रों का अधिक होना कृषि योग्य बेकार भूमि, पड़ती भूमि की अधिकता एवं खरीफ-रबी फसलों के सिंचित क्षेत्र का कम होना इन सभी कारणों से यहां की जनसंख्या अत्यंत विरल है।

जनसंख्या वृद्धि दर

एक विशिष्ट अवधि में किसी क्षेत्र की जनसंख्या में परिवर्तन को जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं। यह परिवर्तन धनात्मक या ऋणत्मक हो सकता है। जिले की जनसंख्या देश के अन्य क्षेत्रों की जनसंख्या के समान ही निरंतर बढ़ती जा रही है।

सारणी क्रमांक 4 राजनांदगाँव जिला: जनसंख्या वृद्धि 1971 से 2011

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2011

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22.85

17.67

स्रोत: जिला सांख्यिकीय पुस्तिका 2001 एंव 2011

 

वर्ष 1971 में यहाँ की जनसंख्या 7,74,069 थी ,यह वर्ष 2001 एवं 2011 की जनगणना में बढ़कर क्रमशः 12,83,224 तथा 15,37,133 हो गयी है। परिवार नियोजन कार्यक्रम की आंशिक सफलता शिक्षा का प्रचार -प्रसार ,साक्षरता प्रतिशत में वृद्धि एवं प्रवास में कमी से वृद्धि दर 1981 में 14.91,1991 में 22.43 एवं 2001 में 17.82 तथा 2011 में 19.78 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तर की तुलना में जिले की जनसंख्या में वृद्धि दर 2.11 प्रतिशत अधिक तथा राज्य की तुलना में जिले की जनसंख्या वृद्धि दर-3.07 प्रतिशत कम है।

 

अध्ययन क्षेत्र में विभिन्न विकासखण्ड स्तर पर पुरुष एवं महिला जनसंख्या वृद्धि दर में बहुत असमानता मिलती है। जिले में पुरुष जनसंख्या वृद्धि दर 20. 25 प्रतिशत एवं महिला जनसंख्या वृद्धि दर 19.32 प्रतिशत है। जिले के उत्तरी एवं मध्यवर्ती क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है। जिले के उत्तरी क्षेत्र के अंतर्गत छुईखदान विकासखंड में दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर सबसे अधिक (26.40 प्रतिशत) है। इसके बाद 22.96 प्रतिशत की वृद्धि दर खैरागढ़ विकासखंड में मिलता है। मध्यवर्ती क्षेत्रों के अंतर्गत छुरिया एवं डोंगरगांव विकासखण्ड का स्थान आता है, जहां जनसंख्या वृद्धि दर क्रमशः 23.52 एवं 21.75 प्रतिशत है। उत्तरी एवं मध्यवर्ती क्षेत्र में उच्च जनसंख्या वृद्धि दर होने का मुख्य कारण यह है कि यहाँ जीवन यापन के लिए मूलभूत सुविधाओं की अधिकता अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक है।

 

लिंगानुपात

लिंगानुपात किसी क्षेत्र के वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दशाओं का सूचक होता है तथा प्रादेशिक विश्लेषण के लिए उपयोगी साधन है। किसी जनसंख्या के लिंग संरचना को सामान्यता स्त्री-पुरुष अनुपात के रूप में व्यक्त किया जाता है। अध्ययन क्षेत्र में लिंग अनुपात प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1015 है जबकि छत्तीसगढ़ राज्य में लिंगानुपात 991 अध्ययन क्षेत्र के पड़ोसी जिला दुर्ग में लिंगाअनुपात 966 है।

 

इस प्रकार अध्ययन क्षेत्र की लिंगानुपात छत्तीसगढ़ राज्य दुर्ग जिले की तुलना में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या क्रमशः 24 49 व्यक्ति अधिक है। भारत में लिंगानुपात 943 है। अध्ययन क्षेत्र के लिंगानुपात राष्ट्रीय स्तर की तुलना में भी 72 व्यक्ति अधिक है। अध्ययन क्षेत्र में लिंगानुपात अधिक होने का एक कारण यह भी है, कि यहाँ प्रसव पूर्व-लिंग परीक्षण सामान्यतः नही करवाया जाता है दुसरा कारण बालक-बालिकाओं में भेदभााव प्रायः कम होना मुख्य कारण है।

 

आयु संरचना

जनसंख्या की आयु संरचना उसकी आधारभूत जैविक विशेषता है। मनुष्य की आयु उसकी आवश्यकताओं, कार्यक्षमताओं तथा विचारों को प्रभावित करता है। आयु मनुष्य की क्षमता का सूचकांक होता है। किसी राष्ट्र के जनसंख्या की आयु संरचना के अध्ययन से हम उसके जनशक्ति की पूर्ति, निर्भरता-अनुपात तथा सामाजिक-आर्थिक क्रियाकलाप संबंधी ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं किसी भी जनसंख्या का आयु संघठन सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं जैसे सामाजिक तथा

 

राजनीतिक प्रवृत्तियों, आर्थिक क्रियाकलाप, सैनिक सेवा तथा गतिशीलता आदि को प्रभावित करता है

 

आयु-संबंधी आँकड़ों के विश्लेषण की विधियांः-

भूगोलवेत्ताओं के द्वारा निम्नलिखित 3 विधियो से आयु संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है। पहला आयु पिरामिड के द्वारा दूसरा आयु वर्ग बनाकर एंव तीसरा आयु सूचकांक ज्ञातकर।

 

प्रस्तुत अध्ययन में आयु संबंधी आँकड़ों का विश्लेषण आयु वर्ग के द्वारा किया गया है।

इसके लिए अध्ययन क्षेत्र की संपूर्ण जनसंख्या को भारत के संदर्भ में सामान्यतया 4 प्रमुख वर्गों में अध्ययन किया गया है -

1. बाल आयु वर्ग 0 -14 वर्ष.

2 युवा वर्ग 15-39 आयु वर्ग

3 प्रौढ़ आयु वर्ग 40से 59 वर्ष

4 वृद्ध आयु वर्ग 60 65 ़से अधिक

 

1. बाल आयु वर्ग- इस आयु वर्ग में 15 वर्ष से कम आयु के बालक बालिकाओं को सम्मिलित किया जाता है। अध्ययन क्षेत्र में इस आयु वर्ग के बालक बालिकाओं का प्रतिशत 36..24 है।

 

2 .युवा आयु वर्ग - इस आयु वर्ग में 15 से 39 आयु वर्ग के पुरुष महिला जनसंख्या को सम्मिलित किया जाता है। अध्ययन क्षेत्र मे इस आयु वर्ग के व्यक्तियों का प्रतिशत 39.58 है।

 

3. प्रौढ़ आयु वर्ग- इस आयु वर्ग में 40 से 59 वर्ष के व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है। अध्ययन क्षेत्र में इस आयु वर्ग के व्यक्तियों का प्रतिशत 16.44 है।

 

4. वृद्ध आयु वर्ग - इस आयु वर्ग के अंतर्गत 60 65 से अधिक आयु के व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है। इस आयु वर्ग के व्यक्तियों का प्रतिशत 7.74 है। आयु संबंधी उपयुक्त वर्गीकरण से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में बाल एवं युवा आयु वर्ग के व्यक्तियों का प्रतिशत सबसे अधिक (75.82) है तथा प्रौढ़ एवं वृद्ध आयु वर्ग के व्यक्तियों का प्रतिशत 24.18 है

 

शिक्षा एवं साक्षरता

जनसंख्या संरचना में साक्षरता का महत्वपूर्ण स्थान है। निरक्षरता एवं अशिक्षा विकास के कार्यक्रमों की सफलता में बाधक सिद्ध होती है। तीव्र गति से आर्थिक विकास करने देश में सामाजिक समरसता एवं समानता लाने तथा लोगों के आचरनात्मक समुन्नयन को गति प्रदान करने का एकमेव प्रतिमान या कारक शिक्षा ही है। इसके अतिरिक्त शिक्षा,जन्म दर,मृत्यु दर,विवाह की आयु, प्रवास तथा आर्थिक प्रतिरूपों को भी प्रभावित करता है। अध्ययन क्षेत्र में कुल साक्षरता दर 75.96 प्रतिशत हैा पुरुष साक्षरता दर 86.40 महिला साक्षरता दर 66.70 प्रतिशत है।

 

यहां अध्ययन क्षेत्र में विकासखण्डवार साक्षरता प्रतिशत में बहुत विभिन्नता मिलती है। जिले के मध्यवर्ती क्षेत्र जिसके अंतर्गत राजनांदगाँव डोंगरगाँव विकासखंड आते हैं। यहां साक्षरता दर सबसे अधिक है। यहां साक्षरता दर क्रमशः 81.66 79 .03 प्रतिशत है। जिले के उत्तरी क्षेत्र (छुईखदान विकासखण्ड) मे साक्षरता दर सबसे कम 67.74 प्रतिशत है, शेष विकासखण्ड क्षेत्रों में साक्षरता दर 72.0 8 से 77.97 के मध्य है। जिले के ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में भी साक्षरता के वितरण प्रतिशत में बहुत विषमता पाई जाती है यहां ग्रामीण साक्षरता दर 73.86 नगरीय साक्षरता दर 85.43 प्रतिशत है द्य जिले के ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्र में पुरुष महिला साक्षरता दर में भी काफी विविधता मिलती है द्य ग्रामीण क्षेत्र में पुरुष साक्षरता दर 84 है वही नगरीय क्षेत्र में 91.59 प्रतिशत है। अतः यहां ग्रामीण एवं नगरीय पुरुष साक्षरता दर में 7.59 प्रतिशत का अंतर पाया गया है। इसी प्रकार ग्रामीण नगरीय महिला साक्षरता दर में भी अधिक विभिन्नता मिलती है। अतः क्षेत्र में ग्रामीण महिला साक्षरता दर 63.96 नगरीय महिला साक्षरता दर 79.26 प्रतिशत है। निष्कर्ष रूप में कहा जा

 

सकता है कि जिले के मध्यवर्ती क्षेत्र समतल भू-भाग होने के साथ-साथ यहां पर शैक्षणिक सुविधाओं की पर्याप्त उपलब्धता होने के कारण साक्षरता का स्तर उच्च है। एवं जिले के उत्तरी क्षेत्र मैकल पहाड़ी प्रदेशों के अंतर्गत आता है इसी कारण यहां पर परिवहन शैक्षिक सुविधाओं का प्रायः अभाव होने के कारण न्यून साक्षरता दर मिलता है। इसके अतिरिक्त जिले के दक्षिणी क्षेत्र जो आदिवासी एवं वनांचल क्षेत्र होने के साथ ही साथ यहां पर शैक्षिक सुविधाओं की संख्या उत्तरी क्षेत्र की तुलना में अधिक होने के कारण यहां साक्षरता दर मध्यम है।ै

 

जनसंख्या की व्यवसायिक संरचना

जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना का विश्लेषण अनेक आर्थिक समाजिक पक्षों को प्रकट करता हैं इससे किसी क्षेत्र की संपूर्ण जनसंख्या में कार्यरत जनशक्ति एवं पराश्रितों का अनुपात ज्ञात होता है। अध्ययन क्षेत्र में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ की सांस्कृतिक परंपराओं का व्यक्तियों द्वारा जीविकोपार्जन हेतु किए जाने वाले व्यवसाय पर विशेष प्रभाव पड़ा है। जिले में 2011 की जनगणना के अनुसार 52.05 प्रतिशत जनसंख्या कार्यशील है, इसमें 54.58 प्रतिशत पुरुष तथा महिला 45.42 प्रतिशत है। यह क्षेत्र के औसत कार्यशील जनसंख्या के प्रतिशत से कम है।

 

राजनांदगाँव जिले में कुल कार्यशील जनसंख्या का 55.34 प्रतिशत कृषि कार्यों में संलग्न है। इसमें 34.60 प्रतिशत कृषक है तथा 20.74 प्रतिशत कृषि-मजदूर है। पारिवारिक उद्योगों में 1.10 प्रतिशत एवं 18.04 प्रतिशत जनसंख्या अन्य कार्यों में संलग्न है। सीमांत कार्यशील जनसंख्या 25.52 प्रतिशत है। राजनांदगाँव में कृषक जनसंख्या का सबसे कम दबाव हैं। यहां कृषक जनसंख्या का प्रतिशत 20.19 है, वही अन्य कार्यों में कार्यशील जनसंख्या का प्रतिशत सर्वाधिक 45.30 है।

 

कृषक एवं कृषि मजदूर कार्यशील जनसंख्या में कृषक एवं कृषि मजदूर एक महत्वपूर्ण तथ्य है इससे जिले में कृषि आर्थिक सामाजिक पृष्ठभूमि का स्पष्ट मूल्यांकन किया जा सकता है। राजनांदगाँव जिले में कुल कार्यशील जनसंख्या में कृषक 34.60 प्रतिशत एवं 20.74 प्रतिशत कृषि मजदूर है। यहां कृषि मजदूर औसतन 4 से 5 घंटे कार्य करते हैं, तथा इन्हें वर्तमान में 80 से 100 मजदूरी के रूपय में प्राप्त होते हैं।

 

निष्कर्ष -

प्रस्तुत शोध प्रपत्र में जनसंख्या संबंधित आँकड़ों के विवेचन से यह स्पष्ट है, कि अध्ययन क्षेत्र में जनसंख्या वितरण, वृद्धि, शिक्षा एवं साक्षरता पर प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक कारको का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है, जिसके कारण जिले की जनसंख्या के वितरण मे व्यापक असमानता पाई गयी है। इसके साथ ही ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या-अनुपात, व्यवसायिक संरचना कार्यशील जनसंख्या-अनुपात आदि पर भी मानवीय एवं सांस्कृतिक कारको का विशेष प्रभाव पड़ा है। जनसंख्या की निरंतर वृद्धि से अध्ययन क्षेत्र के संसाधनों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता जा रहा है जिसे परिवार नियोजन के विभिन्न साधनों के प्रयोग से रोका जाना आवश्यक है ताकि जिले में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो सके और उसके सामाजिक-आर्थिक स्तर को ऊँचा उठाया जा सके। इसके अतिरिक्त सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए क्षेत्र में अशिक्षा, अज्ञानता एवं गरीबी को दूर करना तथा ग्रामीण महिला साक्षरता भी प्रतिशत में वृद्धि आवश्यक है। पिछडे हुए एवं वनांचल क्षेत्र मे जीवननोपयोगी सुविधाओं का विकास करना जनसंख्या संबंधी नीतियों का उचित क्रियान्वयन करना अत्यंत आवश्यक है।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

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5.    यादव रविंद्र सिंह एवं श्यामदेव यादव, हरदोई जनपद में जनसंख्या वृद्धि का भौगोलिक विश्लेषण ,उत्तर भारत भूगोल पत्रिका, अंक - 1 मार्च 2011, पेज क्र. 75- 76

6.    सिंह, लालकेश्वर प्रसाद एवं गौतम कुमार आजमगढ़ जनपद के जनसंख्या का क्षेत्रीय प्रतिरूप, उत्तर भारत भूगोल पत्रिका अंक -43, संख्या, 3 सितंबर, 2013 पेज क्र.9 श्रीवास्तव, महेश कुमार एवं अनिता सिंह, उत्तर प्रदेश में महिला साक्षरता का स्थानिक वितरण प्रतिरूप Journal of Integrated Development and Reserch vol-2, Dec-2012,P.85

 

 

Received on 04.05.2022        Modified on 28.05.2022

Accepted on 16.06.2022        © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2022; 10(2):69-78.